Wednesday, December 28, 2016

लगता बेगाना सा है,


हर कोई अपना सा है, पर लगता बेगाना सा है,
यहाँ भीड़ में  हैं सब खड़े, पर अकेले जहाँ में लगते,
हाँ, इस बदलते वक़्त में हर कोई रिस्ते तो निभा रहा है,
पर चुपचाप सा अपनी उँगलियों को उलझा सा रहा है,
जहाँ भर को अपने होने का अहसास दिल रहा है,
पास होकर भी अपनों से दूर हो रहे हैं सब यहाँ,
कभी सोचती हूँ तकनीक के  युग में सब अच्छा सा है,
पर सब यहाँ पराया होने का अहसास दिला रहा है,
कोई अब घरों के छज्जो पर नज़र नहीं आता है,
पार्कों की चहल- पहल न जाने कहाँ गम सी हो गयी  है,
कोई घर के आंगन में  अब चहचहाता नहीं है,
वो शाम ढले चौबारों में अब रौनकें कहाँ ढूंढें,
वो सर्द सुबह में धुप में सेंकते किसे ढूंढें,
अब तो दालान भी सूने हो गए हैं,
बंद कमरों में एक दुसरे के पास होकर भी दूर हम हो गए है,
दावतों में भी अब चुपचाप निवाले सरकाए जाते हैं,
दिल अज़ीज़ भी अब पराये से लगने लगे हैं,
कभी सर उठा कर चलने वाले सर झुका कर चलने लगे हैं,
व्हाट्स अप और फेसबुक की दुनिया में खोये रहे,
 इनसे ही टूटते हुए रिश्तों को  हमने देखा हैं,
रिश्तों के धागों में गांठ इनसे ही लगते हुए,
एक दुसरे का विशवास बिखरते हुए हमने देखा है,
नहीं कहती कि स्मार्ट फ़ोन बंद हो जाएं,
'पर ये भी नहीं चाहती, इसमें ही रिश्ते सिमट जाएं,
नहीं चाहती ये तकनिकी दुनिया खत्म हो जाये,
पर नहीं चाहती,  इनसे ही रिश्ते खत्म हों जाएं॥

#AloneInWorldOfTechnology



Sunday, December 4, 2016

थोड़ा सा रामराज्य

इन दिनों कुछ लोग बदलने से लगे हैं,
पडोसी भी अब आकर दर्द बाँटने लगे हैं,
'न किसी के घर के ताले अब टूट रहे हैं,
न किसी की जेब पर अब डाके पड़ रहे हैं,
लगने यूँ लगा है की जैसे थोड़ा- थोड़ा ही सही,
देश अब रामराज्य की तरफ बढ़ रहा है,
लुट  तो सब  गए है सभी, फिर भी, 
शिकायत न कोई दर्ज करा रहा है,
कानून भी लगता है दायरे में सिमट सा गया है,
धर्मस्थल पर अब किसी दंगाई की नज़र भी न पड़ रही है,
दुकानों में भी सन्नाटा सा पसर गया हिअ,
जिनकी जेबों में मैले- कुचले नोट होते थे,
अचानक से वो ही अमीर हो गए हैं,
बंगलों के दरबान भी साहब से रईस हो गए हैं,
नींद साहबों की उड़ती देख दबी हंसी में कहकहे लगा रहे हैं,
खुश हैं सब ये सोच कर दूसरा दुखी है,
दूध की नदियां जिस देश में थी बहती,
वहां नोट देखो  नदियों में बह रहें हैं, 
एक ही रात में देखो कैसी नींद उड़ाई है,
गरीबों को देखो कैसे नोटों की गड्डियां थमाई हैं,
हर रोज़ नए जुमलों से धनासेठों की कैसे नींद उड़ाई जा रही है,
चलो थोड़ा सा ही सही रामराज्य जैसे आ गया है ॥ 

Sunday, November 6, 2016

पराया सा लगने लगा है

होड़ लग गयी है फैशन की कुछ इस तरह ज़माने में,
ढकने के लिए अब तन पर कपड़ों की जगह टैटू ने ले ली है,
शर्मो हाय ताक पर रख कर फ़टे कपड़ों को ही फैशन बना लिया है,
कहीं जीन्स घुटने से फटी फैशन में शुमार हो गयी है,
कहीं एक आस्तीन ही काटने का फैशन चल पड़ा है,
जिस देश में सीता, अहिल्या सी नारी हुई हैं,
नारी उस देश की तन ढंकने को अपमान समझने लग गयी है ,
कहने वालों के मुंह बंद करने को सड़कों पर उत्तर यूँ आती हैं,
मानों उनकी जेब से कुछ रूपये चुरा लिए गए हों,
गरीबी और अमीरी कपड़ों से नापी जाने लगी है,
जिसके तन पर कपडे हों पूरे वो ही अब गरीब कहलाने लगी है,
न जाने कब और कैसे संस्कृति तार- तार होने लगी है,
हाथों में जाम और मुंह में धुआँ, संस्कारों का नया सिलसिला चल पड़ा है,
कुछ कहने से पहले बुजुर्गों के मुंह थरथराने लग जाते हैं,
खुद अपने ही घर में नज़रबंद से वो होने लगे हैं,
ये कैसा देश हो रहा है, ये चलन शुरू हो गया है,
यहाँ सब कुछ पराया सा अब लगने लगा है ॥


Wednesday, November 2, 2016

indispire शून्य सा अस्तित्व

हाँ माना शून्य की खोज आर्यभट्ट ने की थी,
पर शून्य के बिना धरा पर क्या किसी का है अस्तित्व यहाँ,
धरती भी तो एक शून्य के आकार की तरह ही है गोल,
ज़ीरो की कहानी कुछ इस तरह लिखती हूँ मैं अपनी जुबानी,
नज़रों में था नगण्य (शून्य) सा अस्तित्व  मेरा,
बस सबकी खातिर जिंदगी जिए जा रही थी एक शून्य  की तरह,
सबकी नज़रों में थी खटकती सी मैं,
फिर भी खुद की आँखों से न टपकने दिया एक मोती मैंने,
मोती भी तो आकार में होता है एक शून्य की तरह,
अचानक एक रोज़ एक हवा का झोंका मेरे मन को महका सा गया,
शून्य से निकल खुद को हीरो बनाने का रास्ता यूँ दिखा गया,
खुद में छिपे हुनर को चमकाने का हुनर वो सिखा गया,
खुद को साबित करने की राह पर निकल पड़ी कुछ इस तरह,
जीरो को जीरो से हरा कर आज मैं खड़ी हूँ एक नायिका की तरह।
indispire




Thursday, October 20, 2016

#RavanVadhh कुछ तो गरिमा को रहने दो,

राम ही तो रावण का आधार थे,
हाँ था अहंकार उस रावण में,
पर नहीं था व्यभिचार उस रावण में,
खुद ही मिट जाने के वास्ते ,
परस्त्री का अपहरण किया उसने,
स्पर्श न किया परस्त्री को,
खूबसूरती के पैमानों को न तोलो रंगों के आधार पर,
गुलाब की खूबसूरती को काँटों की चुभन सहना ही पड़ता है,
जहाँ कुर्सी के पीछे एक दुसरे पर कीचड़ उछाला  जाता है,
अब स्वच्छ राजनीती के पैमानों को संसद के भीतर  लाना है,
देश को न बेचो ऐ नेताओं, कुछ तो गरिमा को रहने दो,
इस देश के सम्मान को यूँ इस तरह न रुसवा करो,
सड़कों पर घूमते  रावणों को अब मार गिराना है,
गर्भ में पल रही हर कन्या को भी है बचाना,
जो शहीद हो जाते हैं तुम्हारी खातिर उनके सम्मान को,
हर हाल में सम्मान दिलाना है,
कानून की आँखों की पट्टी को अब है खोल न्याय सबको दिलाना है,
घर में पलते हर रावण को भी जड़ से उखाड़ फेंकना है,
सोने की चिड़िया कहलाने वाले इस देश को एक बार सोना बना लो,
मन की हर बुराई को उखाड़, एक स्वच्छ भारत बना लो,
ऐ खुदगर्ज इन्सां कुछ रावण से भी सीख लो,
खुद की बुराई ख़त्म करने, अच्छाई से खुद मर मिटा ॥


Wednesday, September 21, 2016

वक़्त हुआ है अब कुछ कर गुजरने को

बंद दरवाजों से आज फिर सिसकियाँ सुनाई पड़ रही  हैं,
फिर एक बार आतंक के शोर में चूड़ियों की खनक खो गयी है,
किसी के सर से फिर एक बार पिता का साया उठ गया है,
किसी पिता के काँधे पर फिर एक बेटे का शव जा रहा है,
आज फिर कुछ दरवाजों पर सन्नाटा बिखर गया है,
कब तक यूँ सड़कों पर शोर- शराबा मचता रहेगा,
क्या किसी को उनका दर्द भी नज़र आएगा,
जिसने न केवल खोया है लाल अपना,
पेट भरने का सहारा भी जिसका अब चला गया है,
अब तो आँखों के परदों को हटा लो,
सड़कों पर  उनके सम्मान को यूँ न रुसवा करो,
जो गए है उनके हिस्से की जिंदगी एक बार जी कर के तो देखो,
किसी अपने के खोने के अहसास को तो जी करके देखो,
शीश नवा दो अब उनको चरणों तले, लाल खोये हैं जिन्होंने अपने,
अब नहीं रहा समय आवाज़ बुलंद करने का ,
वक़्त हुआ है अब कुछ कर गुजरने को,
वक़्त हुआ है अब कुछ कर गुजरने को ॥ 




Friday, September 2, 2016

वक़्त इस कदर बदलता सा जा रहा है,

वक़्त इस कदर बदलता जा रहा है,
हर रिश्ता, रिश्तों से दूर होता जा रहा है,
चुपचाप अब तो फ़ोन से रिश्तों को निभाया जा रहा है,
जो दूर हो गए थे उनको कहीं यहाँ, कहीं वहां ढूँढा जा रहा है,
जो पास रिश्ते थे दूर उनको किया जा रहा है,
नहीं अब आता है वो छुटी वाला रविवार,
दो घडी धूप में बैठ गपशप का दौर ख़त्म से हो रहा है,
छतों की मुंडेर सूनी सी पड़ी रहती हैं, कोई पक्षी भी नज़र कम ही आता है,
बॉलकोनी से दोस्ती निभाई जाने लगी है,
कोई अपना सा लगने वाला पराया सा होता जा रहा है,
वो जो पराये थे न जाने कब अपने से लगने लगे हैं,
नानी- दादी की गोद में सर रख कहानियां सुनना,
बीते दौर का सपना सा होता जा रहा है,
दादा की ऊँगली थामे कोई बचपन पार्कों में नज़र अब आता नहीं है,
बचपन के कांधों पर किताबों का बोझ बढ़ता जा रहा है,
बचपन बंद कमरों में सिमट सा रहा है,
वक़्त इस कदर बदलता सा जा रहा है,

Saturday, August 27, 2016

सबसे जुदा मैं हूँ #Knowyourself .

Indispire Edition 132
जैसी भी हूँ, सबसे जुदा मैं हूँ,
अलग दुनिया में लिखती अपनी दास्तान हूँ,
खुद के बनाये पन्नों में बिखराती अपनी दुनिया में मशगूल मैं हूँ,
न कोई मुझसे ऊपर, न कोई मुझसे अच्छा,
करती हूँ नाज़ खुद पर हूँ,
अपने मन में,  अपनी ख़ुशी में झूमती नाचती मैं हूँ,
शिकवा करने वालों से दूर रह कर खुशबू खुद की फैलाती मैं हूँ,
बंद दरवाजों से छनती धूप सी मैं हूँ,
ऊषा की किरणों से रक्तिमा फैलाती ख़ुशी की किरण हूँ,
जो दिल कहे मानती मैं हूँ, 
जो दिमाग कहे करती मैं हूँ,
 न डरना चाहती हूँ,
न डराना चाहती हूँ,
संगीत की तरन्नुम मैं हूँ,
किताबों के पन्नों की दास्ताँ मैं हूँ,
इतिहास बनाना चाहती मैं हूँ,
भविष्य के सपनों में उड़ना चाहती मैं हूँ,
खुद को सबसे आगे मानती हूँ,
हाँ खुद को खुद से ज्यादा जानती मैं हूँ,
जैसी भी हूँ, सबसे जुदा मैं हूँ ॥ 


Saturday, August 13, 2016

आसाँ नहीं यूँ ही चले जाना

बदलते वक़्त के परिवेश में सब कुछ जैसे भागा सा जा रहा है, कहीं कोई ठहराव नहीं है खासकर आजकल की युवा पीढ़ी। आसानी से किसी भी हालत से घबरा कर उन्हें सिर्फ एक ही रह सूझती है जो सीधे - सीधे आत्महत्या के  प्रेरित करती है।
श्रीराम अय्यर ने अपनी पुस्तक The Story of a Suicide के द्वारा स्पष्ट किया है आत्महत्या के लिए मन को तैयार करना आसान नहीं है, हर विफल इंसान आत्महत्या कर ले यह भी जरूरी नहीं पर आजकल समस्याओं से जूझता युवा वर्ग आसानी से इस ओर अपने कदम बढ़ा लेता है.
मुझे याद है मेरे स्कूल के समय में बहुत हो होनहार और हर क्षेत्र में कामयाब होने वाली एक मेरी ही सहपाठी थी, जिस वर्ष वह स्कूल द्वारा आयोजित  एक प्रतियोगिता को उत्तीर्ण  नहीं कर पायी तो उसने खुद को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. यह मेरे जीवन का बहुत ही  दर्दनाक किस्सा था जिसे मैं काफी समय तक अपने जेहन से निकाल नहीं पायी,  हाँ उससे मुझे प्रेरणा जरूर मिली किसी भी हालात से घबरा कर यूँ मौत को गले लगाना ही समस्याओं का निदान नहीं है, उनसे जूझ  कर जो अपने लिए रह आसान कर लें वो जिंदगी के असली मायने समझते है। 
 यही नहीं आज भी युवा वर्ग ही आत्महत्या आत्महत्या की ओर अधिक अग्रसर हो रहे हैं, फिर चाहे वो गांव का युवा वर्ग हो या शहर का। 
मानती हूँ आज हर क्षेत्र में  युवा वर्ग पर बोझ बढ़ता ही जा रहा है फिर वो चाहे पढाई हो खेलकूद हो या फिर भविष्य की चिंता हो, स्कूल में अच्छे से अच्छे नम्बर लाने  की होड़, घर पर माता- पिता का दबाब, आसपास जुड़े लोगो के द्वारा पूछे जाने की फ़िक्र में आज बच्चे वक़्त से पहले ही बड़े होते जा रहे है ऐसे हालात से उन्हें निपटने के प्रेरित करना होगा। उन्हें इन चुनौतियों से डटकर मुकाबला करने में हाँ उनके माता- पिता का सहयोग जरूरी है । 
श्री राम अय्यर की पुस्तक की कहानी कुछ हरि , चारु, सैम  मणि के इर्द गिर्द घूमती है, ये दोस्ती, प्यार, रिश्ते और विश्वासघात की कोई सीमा नहीं जानते हुए भी एक दुसरे से जुड़े हुए हैं । 
मुझे लगता है हम सभी को अपनी सोच सकारात्मक रख कर जीवन के मार्ग को आसान बनाना चाहिए।
इस पुस्तक में कुल ३१ अध्याय हैं जिसमें से छठा अध्याय दिल को छु लेने वाला  है ॥ 
http://www.storyofasuicide.com

 संघर्षों से भरी मन है ये जिंदगी, 
लड़कर मुसीबतों से उबर राह बनाये जो,
डरकर न लड़खड़ा जाये कदम,
काँटों भरी राह पर चलकर मंजिलें जो आसान बनाये,
है इंसान वो इस जहाँ में हर परिस्थिति में जो अडिग रहे,
घबरा कर मौत को गले लगाना भी कोई आसाँ नहीं,
गर ध्यान से नज़र डालें इस पुस्तक की हर कहानी पर,
हर अध्याय नयी दिशा दे रहा है जिंदगी को आसान बनाने की,
खूबसूरत रचना है ये, हर किरदार में गर खुद को तलाश लो,
खुद को हीरे सा तराश कर खुद की तुम पहचान बना लो ॥ 


Thursday, August 11, 2016

खुश हूँ मैं #choice

खुश हूँ मैं जितना मेरा पास है,
खुश हूँ मैं उनके साथ जो मेरे साथ हैं,
होती जो खुद की कहानी की लेखक,
तो हाँ इस जीवन को शायद फिर दोहरा कर लिख लेती, 
हाँ, इतना तो मैं  जरूर कर ही लेती , 
अपनी माँ को इस तरह बचपन में खोने न देती,
उसके प्यार से खुद को न वंचित करती,
पिता के साये को न उठने देती,
उनकी ऊँगली थाम चलने की तमन्ना पूरी कर लेती,
माँ के आँचल से दो बूँद अमृत के पी ही लेती,
फिर भी मैं खुश हूँ उसमें जो मेरे पास और साथ है ॥ 

PS. This is written specifically for INDISPIRE Edition 129 

Tuesday, August 9, 2016

वो

वक़्त बीत गया कुछ इस तरह उनके साथ रहते- रहते,
न कोई शिकवा मन में उनके न कोई गिला रही हमसे,
हाथ सर पर हर वक़्त रहा हमारे कुछ इस तरह ,
न लगा कभी पराया ये घराना हमको,
अब तो चाहत बस इतनी सी रह गयी है,
उनके हाथ सर पर रहे हमेशा रहे वो चाहे जिस भी दुनिया में ॥ 

Thursday, July 14, 2016

खिलखिलाना चाहती हूँ

समझते नहीं दूसरों की तमन्ना, इल्तज़ा उनसे मैं करना चाहती हूँ,
खुले आसमान के नीचे परिंदों की तरह में उड़ना चाहती हूँ,
कुछ दिन बंदिशों से मुक्त होकर खुलकर मुस्कुराना  मैं चाहती हूँ,
दरवाजे की ओट में छिप डराकर खुलकर मैं खिलखिलाना चाहती हूँ,
किसी के साथ बचपन की यादों में मैं फिर एक बार खोना चाहती हूँ,
भीड़ से दूर, अन्धियारे से परे कुछ पल में अकेले ही गुजारना चाहती हूँ,

जी लिया बहुत दूसरों की खातिर, खुद के लिए भी जीना चाहती हूँ,
बच गयी जो उम्र अब है खुद की नज़रों में खुद की पहचान बनाना चाहती हूँ ॥ 

Friday, June 10, 2016

#MyStory दीदार तेरा करती

जन्म देने तक का साथ निभाया था उसने,
न जाने किस खता सजा दी हमको उसने,
एक बार निगाह भर देख तो लेती तुमको,
मैं भी औरों की तरह तेरे गर्म आंचल में छिप लेती,
तेरे चेहरे की हलकी सी धुंध मेरी यादों के अँधेरे में अब भी है,
काश कोई पल ऐसा फिर आ जाये,
तुझे जी भर अपने नयनों में बसा कर रखूं,
अपनी फरमाइशों की फेहरिस्त तुझे सूना लूँ, 
तोतली आवाज़ से फिर तुझे एक बार बुला लूँ,
ऐ! मेरी माँ, मेरी भी चाहत थी उम्र भर दीदार तेरा करती ॥ 



Saturday, April 30, 2016

कुछ पन्ने अधूरे ही रहने दो,

हमने तो चाहा था दिल की गहराइयों से तुमको,
तुम्ही न जाने क्यों दगा देते रहे हमको ,
टूट कर बिखर हम इस कदर गए हैं,
कोई अपना नज़र यहाँ आता नहीं हमको । 

डूबे थे इस कदर तेरी मोहब्ब्त में,
 हर खता माफ़ करते रहे,
अहसास अब हुआ ऐ सनम,
 तुम तो हर पल हमसे बेवफाई करते रहे । 

चाहा था जिसे दिल से वो बेवफा हो चला,
आईने में बसाया था तस्वीर,
 जिसकी वो ही आइना तोड़ चला,
अब करूँ किस पर ऐतबार,
 जब अपना ही कोई दिल तोड़ चला । 

कुछ पन्ने  अधूरे ही रहने दो,
कुछ लम्हे तनहा ही रहने दो,
यूँ कट जाएगी  ये जिंदगी ,
गर तुम  कन्धों का सहारा दे दो । 

Monday, March 7, 2016

संसार, समाज, सफलता, स्वक्षता

संसार 

ईश्वर की सबसे खूबसूरत रचना है यह धरा और इसमें रहने वाले इंसान।

 समाज, 

 यह एक शब्द जो देश की रचना में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रखता है । 

स्वक्षता, सुधार, सम्पन्नता, समृद्धि ,

इन सारे शब्दों की एक स्वस्थ देश की उन्नति में सबसे मत्वपूर्ण भूमिका है

शांति, सहनशीलता, सुंदरता,सज्जनता, 

ये वह शब्द हैं जिनके दम पर कोई भी व्यक्ति कोई भी नारी अपना लोहा मनवा सकता है ।

सफलता,

यह एक शब्द इंसान की शख्सियत को बयां करने के लिए काफी है

सुभाष चन्द्र, सचिन तेंदुलकर, सानिया, शाइना,

 यह वो शख्सियत हैं जिन्होंने देश के सर गर्व से ऊँचा किया है ।
 

Thursday, February 18, 2016

खराश सी दिल में है,

१. कहते हैं दिल के करीब होते हैं जो सबसे अधिक, अक्सर वो ही दूर-दूर रहते हैं,

न जाने क्यों अपने ही अपनों को सबसे अधिक धोखा जिंदगी में देते हैं,


२. सोचती हूँ जब भी  बेवफाई को हम कर देंगे नज़रअंदाज़

बस उस ही पल दिखाई देता है, तेरी बेवफाई का एक नया अंदाज़,


३. तुम अपनी हर खता हमसे छुपाना क्यों चाहते हो मालूम नहीं,

माफ़ किये जाते हैं  हम फिर भी हर पल तेरी हर खता को यूँ ही,

 

४. जिंदगी तुझसे नाराज़ तो नहीं हूँ फिर भी कुछ खराश सी दिल में है,

जो थे दिल के करीब मेरे दिल  के वो ही कुछ खरोंच दिए जाते हैं ,

 

५.  उदास सी  हूँ आज, गम अपने बाँट लूँ किस संग आता नहीं समझ मुझको,

काश!  तुम ही दिल के इतने करीब होते तो दिले-हाल सुना देते तुझको,

 

६. हमारे गालों  पर बनी लकीरों के निशाँ नहीं नज़र तुमको आते हैं,

हर रोज़ तेरी बेवफाई का एक नया नज़ारा देख जो लुढ़क आँखों से आते हैं॥




 

Friday, February 12, 2016

मौसम की मार

एक मुट्ठी चावल बीते चार दिनों से,

छत की मुंडेर पर रखे थे हमने,

कम एक दाना भी न हुआ, मन में बड़ा मलाल इस बात का था,

न जाने कहाँ गुम हो गए हैं चहचहाते वो पक्षियों का टोला,

मौसम की मार में उनकी चहचाहट भी सुन्न सी पड़ रही है,

न दरख्तों पर, न दालानों में, न किसी की छत पर ही ,

अब वो गौरैया कहीं भी नज़र कभी आती है,

घरों की कहलाने वाली वो गौरैया टहनियों पर भी नहीं आती नज़र हैं,

छतों को छोड़िए अब तो दालान भी न रह गए हैं,

आँगन भी बालकनी में बदलने लग गए हैं,

कागा की कांव-कांव भी अब कुछ कम ही सुनाई देने लगी है,

सूखे दरख्तों पर वो गिद्ध भी नज़र आते नहीं हैं,

मृत जीवों को नोचते- खसोटते न कौवे- चील- गिद्ध नहीं दिखते,

दूर देश से  आने वाले पक्षियों का कारवां अब कम सा होने लगा है,

तालाबों में इठलाती, पानी में खिलखिलाती बतखें भी नहीं मिलती है,

सिमट रहा है संसार, जीव- जंतु मौसम और प्रदूषण की मार से॥ 

 

 

 

 


Tuesday, February 2, 2016

बेहतर,सुनहरी सुबह बेहतर दिन #Colgate360GoldMornings

सुबह की ठंडी हवाएं सुकून भरा अहसास दिलाती हैं, सूरज की किरणें धरा पर ऐसा अहसास दिलाती हैं मानों सोने की पर्त बिछी हो।

मैं हमेशा ही अपनी सुबह को और अधिक ताज़ा बनाने के लिए बागवानी करती हूँ, पौधों में पानी देना ऐसा और उनको देखना ऐसा लगता है सुबह और हसीं बन गयी हैं। बागवानी करना सुबह की तरोताज़ा हवा में अपने पौधों के बीच मंद- मंद टहलना ऐसा लगता है की शरीर में फिर से नई स्फूर्ति आ गयी हो.
सबकी दिनचर्या में सुबह उठकर सबसे पहले मुँह की सफाई  करना मुख्य होता है,  मेरा भी है , मैंने अपने दांतों की देखभाल के लिए हमेशा ही कोलगेट के उत्पादों का ही इस्तेमाल किया है , फिर चाहे वह ब्रश हो या पेस्ट.
हमने  सपरिवार कोलगेट के सुरक्षात्मक और बेहतर उत्पादों को ही अपने जीवन में शामिल किया हुआ है।
और अब तो कोलगेट के #कोलगेट ३६० गोल्ड ब्रश को इस्तेमाल करके पूरे दिन ताज़गी और स्फूर्ति का अहसास कायम रहता है।
#Colgate360GoldMornings

स्वस्थ शरीर का आधार ही स्वस्थ दांत, और पेट है।   कोलगेट टोटल पेस्ट को कोलगेट के ३६०चारकोल गोल्ड टूथब्रश पर लगाकर दांतों को साफ़ करने के बाद ऐसा महसूस होता है की दांतों में सोने सी चमक आ गयी हो.
#कोलगेट ३६० चारकोल गोल्ड से ब्रश करने के बाद खुलकर मुस्कुराने का दिल करता है।  इसके बाद अपना नास्ता, खाना और दिनचर्या शुरू करने के लिए एक नयी स्फूर्ति प्राप्त होती है।
कोलगेट का तहे दिल से शुक्रिया।  इसके बारे में और अधिक जानकारी के लिए हम कोलगेट के ऑफिसियल लिंक पर सर्च कर सकते हैं.