Wednesday, March 8, 2017

कैसी है दुविधा ये मेरी,

आँचल मेरा सरकने लगा है  आहिस्ते से सर का  ,
दूसरों को  बेपर्दा होता  देख,
नज़रें फिर भी झुका कर चलती हूँ
जिनसे परदे किया करती थी कभी  मैं,
जुबाँ भी आहिस्ते से ही खुलती है, फिर भी डरती हूँ,
कहीं ज़माने में रुसवा न हो जाऊँ  अपनी बेपर्दगी से,
इस कदर जमाना बदल गया है, सांसे हवा में काँप जाती हैं,
नहीं किसी का डर निगाहीं में,
अब नहीं शर्म किसी की आँखों में रह गयी है,
कैसी है दुविधा ये मेरी,
ज़माने संग चलती हूँ तो बेपर्दा होती हूँ,
दिल की सुनूँ तो उनकी नज़रें नही उठती मेरी तरफ,
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मुझे पूरा तोड़ देता है तेरा आधे मन से बात करना
मुझे उदास यूँ ही कर जाता है तेरा नज़रों को मोड़ लेना,
तू कहे न कहे, मैं समझ तेरी मन की बातों को हूँ,
मुझे हर दम सुस्त करता, तेरा मुझको न समझ पाना





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